Tuesday, February 4, 2014

बसंत राज********


                                              बसंत राज की देखिये निकल रही बरात
                                       मंजरियों का मुकुट शीश धर निकले हैं ऋतुराज 
                                         दुल्हन प्रकृति संवर गई है कर सोलह-श्रृंगार
                                         अमलताश के पहने झुमके ,कुन्दकली के हार 
                                              लज्जा से पीली भई धरा वसंत निहार 
                                               बोराई सी चल रही ,फागुनी मंद बयार 
                                             अमराई में कूक रही है कोयल की शहनाई 
                                             ओर नहीं है छोर नहीं है ,सरसों है पियराई 
                                             लाल पताका फहराते ,पुलकित हुए पलाश 
                                      बिखर गये  है दिग दिगंत में ,रंग-सुगंध-अनुराग*******

                                                                                     
                                       

                                             
                                         बसंत की शुभ कामनाएं
                                                       सभी मित्रों को    
                                                                                      अदिति पूनम *******
                         

37 comments:

  1. वाह अद्भुत ....सुंदर बनरा ब्याहन आया ......धारा मन रूप हर्षाया .....बहुत ही सुंदर ......बसंत पंचमी की शुभकामनायें ,

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  2. वाह...सुन्दर शब्दों में ऋतुराज का स्वागत !!!

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  3. ऋतुराज का सुंदर चित्रण, बधाई शुभकामनाएं

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  4. अहा! बसंत ऋतु मन में उमंग भर ही देता है... मनमोहक रचना. वसंत पंचमी की बधाई.

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  5. सुन्दर वसंत !
    आपको भी बहुत शुभकामनायें !

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  6. बहुत सुंदर....!! बसंत पंचमी की बहुत बहुत बधाई और शुभ कामनाएं ...

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  7. वसंत -दूल्हे का बड़ा प्यारा रूपक बाँधा है -बधाई !

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  8. अदिति जी, वसंत उत्सव की आपको भी बहुत बहुत बधाई..सुंदर रचना..

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  9. बसंत ऋतु की बहुत सुंदर प्रस्तुति...!
    बसंत पंचमी कि हार्दिक शुभकामनाएँ....
    RECENT POST-: बसंत ने अभी रूप संवारा नहीं है

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  10. बसंत पंचमी की बहुत बहुत बधाई और शुभ कामनाएं ...

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  11. वसंत उत्सव की आपको भी बहुत -बहुत बधाई । सुंदर रचना । मेरी कविता "समय की भी उम्र होती है" पर सुदर प्रतिक्रिया प्रस्तुत करने के लिए विशेष आभार।.

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  12. बिखर गये है दिग दिगंत में, रंग-सुगंध-अनुराग....बहुत खूब, वासन्ती रंग में रंगी हुई खूबसूरत रचना... जड़ता में ऊष्मा का संचार है वसंत, अनमनेपन में राग का अंकुरण है वसंत...वसंतोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं..प्रतिक्रिया के लिए आभार...ब्लॉग पर आती रहें...

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट "समय की भी उम्र होती है",पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  14. आपको भी शुकामनाएं..

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  15. सौंदर्य से भी सुन्दर है यह रचना भाषिक सौंदर्य का अपना आकर्षण होता है शब्द बांध का का भी छंद और भाव का भी।

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  16. लज्जा से पीली भाई धरा वसंत निहार
    बोराई सी चल रही ,फागुनी मंद बयार
    अमराई में कूक रही है कोयल की शहनाई
    ओर नहीं है छोर नहीं है ,सरसों है पियराई bahut khoobsoorat rachana basanti rang me rangi hui .....aabhar poonam ji

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  17. आप सभी को आभार ...धन्यवाद ....ब्लॉग पर आकर उत्साहवर्धन केलिए

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  18. सुन्दर प्रस्तुति ,लयात्मक अभिनव शब्द चयन

    लज्जा से पीली भाई को लज्जा से पीली भई कर लें ,ऋतु कर लें ऋतू को

    नेहामय आभार आपकी निरंतर सार्थक टिप्पणियों

    बसंत राज की देखिये निकल रही बरात
    मंजरियों का मुकुट शीश धर निकले हैं ऋतुराज
    दुल्हन प्रकृति संवर गई है कर सोलह-श्रृंगार
    अमलताश के पहने झुमके ,कुन्दकली के हार
    लज्जा से पीली भाई(भई ) धरा वसंत निहार
    बोराई सी चल रही ,फागुनी मंद बयार
    अमराई में कूक रही है कोयल की शहनाई
    ओर नहीं है छोर नहीं है ,सरसों है पियराई
    लाल पताका फहराते ,पुलकित हुए पलाश
    बिखर गये है दिग दिगंत में ,रंग-सुगंध-अनुराग*******


    ऋतू बसंत की शुभ कामनाएं अनंत
    सभी मित्रों को
    अदिति पूनम *******

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  19. उम्दा अभिव्यक्ति ..मरे ब्लाग "सजग " में आपका स्वागत है

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  20. वसंत का सुन्दर चित्रण. आपको भी वसंतागमन की शुभकामनायें.

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  21. वाह ...
    मंगलकामनाएं !!

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  22. शुभकामनायें सुन्दर चित्रण. !

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  23. बहुत ख़ूबसूरत शब्द चित्र...शुभकामनायें!

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  24. सुंदर अभिव्यक्ति....

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  25. खूबसूरत अभिव्यक्ति
    रचना लाजबाब है बधाई

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  26. बहुत ही सुन्दर वसंत का वर्णन किया है .. सरस कविता ..
    मंजरियों का मुकुट शीश धर निकले हैं ऋतुराज
    दुल्हन प्रकृति संवर गई है कर सोलह-श्रृंगार
    अमलताश के पहने झुमके ,कुन्दकली के हार
    लज्जा से पीली भई धरा वसंत निहार

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  27. मन को दुलराती भाषा का अप्रतिम सौंदर्य लिए है ये लयताल का पैटर्न लिए छांदिक रचना।

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  28. लाल पताका फहराते ,पुलकित हुए पलाश

    बहुत सुन्दर...वसन्त का मनोहर चित्रण .....

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  29. शुक्रिया आपकी प्रेरक टिप्पणियों का मीठा लिखतीं हैं आप साहित्यिक तेवर लिए नए प्रतीक रूपकत्व लिए।

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  30. बसंत राज की देखिये निकल रही बरात
    मंजरियों का मुकुट शीश धर निकले हैं ऋतुराज
    दुल्हन प्रकृति संवर गई है कर सोलह-श्रृंगार
    अमलताश के पहने झुमके ,कुन्दकली के हार
    अनुपम प्रकृति चित्रण मदन उत्सव वेलेंटाइन फीका कर दिया शब्द बयार ने आपकी माननीया।जग जग जियो ऐसे ही लिखो।

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  31. बहुत बढ़िया । मेरे नए पोस्ट DREAMS ALSO HAVE LIFE.पर आपका स्वागत है।

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  32. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-03-2017) को

    "दो गज जमीन है, सुकून से जाने के लिये" (चर्चा अंक-2607)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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